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Saturday, 21 November 2015


पांच गलतियों से बना आईएस खूंखार


आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के पैदा होने के लिए अक्सर पश्चिमी और अमेरिकी देशों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन आईएस का खतरा दुनिया पर काफी पहले से था, जिसको लगातार नजरअंदाज किया गया। इस्लामिक स्टेट के बनने में प्रशासनिक तौर पर कई ऐसी गलतियां हुईं जिन्होंने आईएस को और खूंखार बना दिया।

गलती 1
खतरे को समझने में भूल
अमेरिका की तरफ से 2011 में इराक से सेना हटाई गई तो उसे लगा कि उसने एक बढ़ते खतरे का अंत कर दिया है। अमेरिका ने बगदादी के खतरे को कितना कम आंका था यह इसी बात से साबित हो जाता है कि अमेरिका ने बगदादी पर रखी ईनामी राशि को 50 लाख डॉलर से कम कर के 1 लाख डॉलर कर दिया था।

गलती 2
रिपोर्ट पर नहीं डाली नजर
 साल 2012 में आईएस पर आई एक रिपोर्ट को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने देखा तक नहीं। रक्षा एजेंसी के पूर्व प्रमुख जनरल माइकल टी. फ्लाइन ने बताया कि इस रिपोर्ट को किसी ने देखने लायक नहीं समझा। माइकल उस समय एजेंसी के प्रमुख थे। हाल ही में ओबामा ने जॉर्ज डब्ल्यू बुश की इन नीतियों की निंदा की थी।

गलती 3
बुराई करेगी अंत
ब्रुकिंग संस्थान से जुड़े प्रोफेसर मैक्केनट्स जो आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के विशेषज्ञ हैं, उनका कहना है कि अमेरिकी अधिकारियों ने यह मान लिया था कि आईएस अपनी बुराईयों के कारण खुद खत्म हो जाएगा इसके लिए ज्यादा परेशान होनी की जरूरत नहीं है। लेकिन आईएस अपनी बुराईयों के साथ तेजी से बढ़ता जा रहा है।

गलती 4
इराक की  नीतियां हुई असफल
इराक तत्कालीन प्रधानमंत्री नुर अल मलिकी के कार्यकाल के दौरान शिया-सुन्नी विवाद बहुत बढ़ गया। मलिकी को ईरान और अमेरिका समर्थन प्राप्त था। इस दौरान अधिकतर नीतियां शियाओं के लिए ही बनाई गईं। नौकरी से लेकर वेतन तक सुन्नी और शिया समुदाय में फर्क किया जाने लगा। सुन्नी समुदाय के अंदर असंतोष पैदा हुआ तो बगदादी के लिए भर्ती करना आसान हो गया।

गलती 5
सीरिया गृहयुद्ध से मिली मदद
2011-12 के बीच सीरिया में गृहयुद्ध शुरू हो गया। यहां के लोग राष्ट्रपति बशर अल असद को सत्ता से हटाना चाहते थे। असद को रूस जैसी शक्ति का समर्थन प्राप्त था। ऐसे में अमेरिका ने भी विद्रोहियों को मदद पहुंचानी शुरू की। गृहयुद्ध के दौरान रक्का जैसे खुद इलाके में आईएस ने खुद को आसानी से स्थापित कर लिया।

टीबी, हैपेटाइटिस बी संक्रमित शरणार्थियों से डरा अमेरिका



अमेरिका पहुंचे शरणार्थी बच्चों में कुछ बीमारियों का खतरा स्थानीय बच्चों से कई गुना ज्यादा है। इतना ही नहीं इनमें से कुछ बीमारियां संक्रमण से फैलती हैं। इससे वहां भी बीमारियां पांव पसार सकती हैं। अमेरिकन जनरल ऑफ पब्लिक हेल्थ की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। इस रिपोर्ट के बाद अमेरिका और यूरोप में शरण पाने की कोशिश कर रहे शरणार्थियों को नई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

बीमार हैं बच्चे
रिपोर्ट में कहा गया है कि  भूटान, म्यांमार, कांगो, इथोपिया, इराक और सोमालिया से आए बच्चों में बीमारियों का खतरा कई गुना ज्यादा है। ये बच्चे अमेरिका पहुंचने से पहले ग्रामीण इलाकों और शरणार्थी शिविर में रहते थे। वहां उनको स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के कारण स्थिति और ज्यादा खराब हो गई है। ये बच्चे साल 2006 से 2012 के बीच अमेरिका पहुंचे हैं।

बच्चों में मिलीं बीमारियां
हैपेटाइटिस बी
देश                   अमेरिकी बच्चों की तुलना में बीमारी का खतरा (फीसदी में)
कांगो                             788
म्यांमार-थाइलैंड                  771
इथोपिया                          405
सोमालिया                        297


टीबी
देश                   अमेरिकी बच्चों की तुलना में बीमारी का खतरा (फीसदी में)
इथोपिया                          128
सोमालिया                        124
म्यांमार-मलेशिया                 112
कांगो                              111
थाइलैंड                            52
इराक                               34


एस.स्टीरकोरालिस यानि गोलकृमी
देश                   अमेरिकी बच्चों की तुलना में बीमारी का खतरा (फीसदी में)
इराक                                239
इथोपिया                             200
कांगो                               168
म्यांमार-थाइलैंड                   142
सोमालिया                           68
मलेशिया                             50




Monday, 8 July 2013

तबाही का जिम्मेदार कौन ?




मैंने अकसर विकास बनाम विनाश पर बहुत से लोगों का मत सुना है उनको समझने की कोशिश भी की।  ऐसी कितनी ही बहसों का मैं खुद हिस्सा भी रही हूं। मगर इस साल जून में जिस आपदा का शिकार उत्तराखंड जैसे खूबसूरत राज्य को होना पड़ा वो इसी पृष्ठभूमि पर खड़ी एक त्रासदी थी। ये सब कुछ हो जाने के बाद जब मैंने सारी परिस्थितियों को समझना चाहा तो उसका निष्कर्ष यही निकला कि विकास बनाम विनाश सिर्फ बहस करने का एक मुद्दा नहीं है इस देश की एक कड़वी सच्चाई है।


उत्तराखंड में जो भी हुआ हम उसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा कह कर टालना क्यों चाह रहे हैं जबकि हम यह जानते है कि इस सब के पीछे हमारे स्वार्थ थे। हम सब ये अच्छी तरह जानते थे कि जो हम बो रहे हैं वो कोई ऐसी फसल है जो हमें एक ना एक दिन नुकसान ज़रुर पहुंचाएगी। सब कुछ जानते हुए हमने न तो कानूनों की कुछ एहमियत समझी न अपनी परंपराओ की। पहले की धार्मिक यात्राओं से अगर आज की यात्राओं की तुलना करें तो मुनाफे की होड में हमने अपनी कई मान्यताओं को भुला दिया। 1950 से पहले जो यात्राएं होती थी वो चट्टी व्यवस्था के अनुसार हुआ करती थी। इस व्यवस्था में हर पांच किलोमीटर पर ठहरने का एक पड़ाव होता था जहां सारी व्यवस्था की जाती थी। सड़क निर्माण के बाद बहुत तेज़ी से यहां बस्तियों बस गई और आज उन पड़ावो की जगह रंग बिरंगे होटलों ने ले ली है।



पर्यावरण के नियमों को ताक पर रख कर हर तरह से यहां पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। ढलानों पर होटल, मकान, दुकान का निर्माण करना। उत्तराखंड के पहाड़ो के लिए ये कानून है कि वहां 12 मीटर से ऊंची इमारत का निर्माण नहीं होगा। इस कानून का कितना पालन वहां किया जा रहा है ये कहने की ज़रुरत नहीं है। जिस तरफ देखेगे तो आप को बहुमंजिला इमारते ही नज़र आएंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे राजनीतिज्ञ इन सभी चीज़ो से अनजान है। उनके खुद के हित इन सब चीज़ो से कहीं ना कहीं जुडे है। नहीं तो ऐसा कैसे संभव है कि जिस राज्य ने सबसे पहले आपदा मंत्रालय जैसा विभाग बनाया वो ऐसी आपदाओं का सामना नहीं कर सका। इससे ये बात भी साफ है कि किस तरह से इस मंत्रालय में लालफिताशाही अपने पैर जमा चुकी है।

इस सब का ठीकरा सरकार के सिर पर फोड़ कर हम भी नहीं बच सकते क्योंकि हम सब को भी इन सारी बातों का ध्यान खुद भी रखना चाहिए, न सिर्फ उन लोगों को जो वहां के स्थानीय निवासी हैं बल्कि उनको भी जो वहां पर्यटक बन कर जाते हैं।   

पहाड़ों में विकास का श्रेय अगर पर्यटन को दिया जाए तो वहां हो रहे विनाश के लिए भी पर्यटन काफी हद तक ज़िम्मेदार है। आज़ादी के बाद विकास के नाम पर ही पर्वतीय क्षेत्रों में राज्य बसाए गए थे। इस सब के लिए जंगलों की अंधाधुध कटाई, पहाड़ों का काटा जाना, चट्टानों को विस्फोट से उड़ा कर हम अपना काम तो कर लेते हैं मगर कहीं न कहीं हम ये भूल रहें हैं कि ऐसा कर के हम अपनी ही प्राकृतिक धरोहर को खोखला कर रहे हैं। जहां तक पहाड़ो को काटने की बात है तो कई बार ये दलील दी जाती है कि ऐसा ना कर के हम पहाड़ी इलाकों में विकास पहुंचाने में अक्षम हैं,  किसी तरह इस तर्क को मान भी ले तो क्या ये ज़रुरी है कि विस्फोट कर के ही सुरंग निर्माण  किया जाए। बिल्कुल नहीं हमारे पास इसका विकल्प है सुरंग बनाने के लिए अगर टनल बोरिंग मशीन का प्रयोग करा जाए तो इससे  पहाड़ न तो कमज़ोर होते है न ही खोखले। मगर आज हमने काम के खर्चे और समय बचाने के लिए विस्फोट करना ज्यादा सही समझ रखा है।

केदारनाथ जहां सब से ज्यादा तबाही हुई वहां के ऊंचे इलाको में कई ग्लेशियर हैं वहां ज्यादा ज़ोर से बोलने तक की मनाही है। ये सब जानते हुए भी गुप्तकाशी से केदारनाथ तक के लिए कई हवाई जहाज़ रोज़ उड़ाने भरते हैं। जिन इलाकों में ज़ोर से बोलने तक की मनाही है वहां रोज़ हवाई जहाज का शोर हो तो यकीनन ये उन ग्लेशियरो के लिए अच्छा नहीं है। उत्तराखंड में कई बिजली परियोजनाएं चल रहीं है इन सब से तो सभी वाकिफ है मगर क्या  हम ये भी जानते है कि इस सब से जितना भी मलबा निकलता है वो कहां जाता है?


कहीं और नहीं उन्ही नदियों में जिनकी पूजा हम किया करते हैं। ऐसे में जब ये नदियां अपने पूरे उफान पर होती है तो अपने साथ हज़ारों बस्तियां बहा ले जाती हैं। तो अब हम ये क्यों कह रहे हैं कि अलकनंदा नाराज़ है या मंदकिनी नाराज़ है? हम क्या उनकी नाराज़गी का कारण नहीं जानतेहम जानते हैं। सब जानते है शायद तभी अपनी गलतियों का ठीकरा भगवान पर फोड़ कर इसको प्राकृतिक आपदा बता रहे हैं। आज हम ये भूल गए है कि प्रकृति के अस्तित्व को साथ ले कर ही हम अपना विकास भी कर सकते हैं। वरना हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम विस्फोट के ऐसे ढेर पर बैठे है जो बिना किसी चेतावनी के फट जाएगा और हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।  

Saturday, 5 January 2013

सिर्फ आंदोलन नहीं नारी आंदोलन




इतिहास अब उसकी भी कहानी है । वो जो 15 दिन तक जीने के लिए मौत से लड़ती रही।

वो जो खुद मौत की नींद में सो गई मगर अपने पीछे हज़ारो लड़कियों को जगा कर चली गई। अब से पहले कभी भी न्याय के लिए इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं ने एकजुट हो कर आवाज़ नहीं उठाई थी। यह आंदोलन सिर्फ न्याय के लिए एक आंदोलन नहीं था बल्कि एक चुपी टूटने का संकेत था । संकेत था कि बस ! अब और नहीं । संकेत था कि कोई और लड़की अब किसी की हवस का शिकार नहीं बनेगी। संकेत यह भी था कि अब कोई भी अत्याचारों को नहीं सहेगी।

      कहने को तो यह दुनिया का पहला ऐसा अनोखा मामला नहीं था कि जिस से अब तक सब अनजान थे। महिलाओं के लिए भी राह चलते छेडखानी आम बात हो गई थी। इसको या तो सब ने नज़रअंदाज करना सिख लिया था या इसी तरह की घटनाओं के साथ जीना सिख लिया था। इस घटना के होते ही सभी महिलाओं ने पीड़ित युवती के साथ अपनी या अपनी बेटी, बहन की छवि को उसमें देखा जो रोज़ ऐसी छेडखानी का सामना करती है। सबसे बड़ा कारण यही था जिससे ज्यादा से ज्यादा महिलाएं इस आंदोलन में जुड़ी। इसमें ना सिर्फ छात्राएं थी बल्कि कामकाजी वर्ग के साथ साथ गृहणियां भी शामिल थी। सभी वर्ग की महिलाए खुद से इस आंदोलन का जुड़ाव महसुस कर रही थी।

      सभी इसको सुधार की एक सीढ़ी की तरह  देख रहीं हैं। सुधार मानसिकता में, सुधार समाज में , सुधार महिलाओं की स्थिति में। रोज़ेन बर ने कहा है कि महिलाओं को यह बात समझनी अभी बाकि है कि उसको बराबरी या सत्ता कोई नहीं देगा उसे इसको छीनना ही होगा। यह बात अब महिलाओं के समझ में आ गई है। इस लिए अब वो अपने अधिकारों अपनी स्वतंत्रता के लिए उठ खड़ी हुई हैं। वो अब थक चुकी हैं कि महिला होने के नाते उसे समाज में हर कदम पर समझौते करने पड़ेगे। आखिर वो ही क्यों ? इस सवाल का जवाब ढुढ़ने के लिए ही सब सड़को पर उतरे थे एक आवाज़ बन कर। लड़कियों में यह जज़्बा था कि वो जो कभी इन सब मामलों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती थी चुपचाप सब सहती थी इस के माध्यम से ही सही समाज में अपनी आवाज़ तो उठा पाएंगी।

      औरतों को हमारे समाज में कभी भी बराबरी का मौका नहीं मिलता । हमेशा से ही एक पितृसत्ता उस के ऊपर होती है। शादी से पहले पिता शादी के बाद पति और बुढ़ापे में आ कर बेटा। कदम कदम पर उसको किसी का मौहताज कर दिया जाता है। हमेशा उसको खुले प्रतिस्पर्धा वाले माहौल में आने के लिए जद्दोजहत करनी पड़ती है। उसको सिखाया जाता है कि ये दुनिया भले सब के लिए गोल है मगर उसके लिए यह चपटी है। अगर वो यहा घूमेगी तो एक सिरे पर आ कर गिर जाएगी। इसलिए हमेशा एक बैसाखी उसको पकड़ा दी जाती है। जिसकी शक्ल हर कदम पर बदल दी जाती है।

      इसलिए इस आंदोलन को एक नारी आंदोलन की तरह देखा जाना जरुरी हैं। ना बल्कि देखा जाना इसके लिए ऐसे ठोस कदम भी उठाने की ज़रुरत है जिसके रहते फिर कभी स्त्रियों को किसी तरह की बैसाखी की ज़रुरत ना पड़े और ना ही अपने अधिकारों के लिए लड़ने की जरुरत पड़े।

Saturday, 8 December 2012

अब बढेंगी मुश्किले।।

                    खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष  विदेशी निवेश के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के दो  प्रमुख विरोधी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी संप्रग सरकार के साथ खड़े दिखे। पहले तो इन दोनों ने ही विदेशी निवेश को ले कर अपने पत्ते नहीं खोले थे और काफी हद तक इसको देश के हित में मानने को तैयार नहीं थे। समाजवादी पार्टी तो अब तक ये ही कह रही है की वो उत्तर प्रदेश में इससे नहीं लाएगी।  दोनों दलों  ने मेहेज़  अपनी  भाजपा से दूरी  बनाए रखने के लिए ही इस प्रस्ताव का समर्थन किया। जिसके चलते खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर  विपक्ष द्वारा लाये गए प्रस्ताव जिसमे इसको रद्द करने की बात थी , में विपक्ष का विरोध किया।
                    यहाँ तक तो बात समझ में आती है मगर असली मुसीबत समाजवादी  पार्टी के लिए अब खड़ी होने जा रही है। बसपा ने जब सरकार का समर्थन किया था तो उसके पीछे उसकी विशेष मंशा छुपी हुई थी।  बसपा का ऐसा मानना  है की ताज कोरिडोर मामले में भाजपा ने उनको फसाया। इस वजह से एक बदले की तरह ही सही बसपा भाजपा के विरोध में खड़ी  है। साथ ही कही न कही बसपा की ये मंशा भी ज़रूर रही होगी की सरकार का समर्थन कर देने से बसपा पर लटक रहा सीबीआई के  शिकंजा से उससे कुछ राहत मिल जाए।
बसपा ने एक तरह से सरकार का समर्थन कर के अप्रत्यक्ष रूप से एक समझौता  किया है। असल मुद्दा अब संविधान संशोधन का है। जिसमे अनुसूचित जाती और जनजाति को पदौन्नती में   आरक्षण देने की बात है।


                इस सब को दखते हुए मुसीबत अब समाजवादी  पार्टी के लिए बढ़ने वाली है। सपा का कहना है की यह संशोधन का प्रस्ताव देश के 85 प्रतिशत जनसँख्या का विरोध करता है। अगर ये प्रस्ताव लाया जाता है तो इस  पर सपा सरकार के साथ खड़ी  नहीं होगी। इतना ही नहीं भविष्य के लिए भी सपा संप्रग सरकार से सचेत हो जाएगी। इस मुद्दे पर यदि सभी दल एक साथ भी खड़े हुए तो भी सपा इसके विरोध के मुड में ही दिख रही है। जिस सपा ने संप्रग सरकार को आखरी वक्त पे आकर मुसीबत से निकला है चाहे वो खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का मामला हो या राष्ट्रपति चुनाव का, उसे 2014 के  लोकसभा चुनाव में संप्रग से बदला निकलने का मौका अवाश्य मिल जाएगा और वर्त्तमान के समीकरणों को देखे तो  हो सकता है संप्रग को उस समय सपा के सामने अपने घुटने टेकने पद जाए।
 

Sunday, 19 August 2012

सोशल मीडिया-एक अभिशाप ?

असम और म्यांमार में हो रही हिंसा की लपटे अब देश  के दूसरे कोने में भी उठने लगी है। पुणे, मुंबई या उत्तर प्रदेश हर जगह लोग अल्पसंख्यको पर हो रहे हमले को ले कर लोग आक्रोशित है।मगर कही न कही इन चिंगारियों को हवा देने का काम सोशल मीडिया का रहा।
वर्त्तमान में जो कुछ भी हो रहा है यह मात्र उदहारण स्वरुप है। आज लोगो ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल तो धडल्ले से करना सीख लिया है मगर वहीँ इसकी संवेदनशीलता को नज़रंदाज़ किया है। जिसका परिणाम आज हमारे सामने है। जिस समाज में हम रह रहे है वहां बल्क एसएम्एस को प्रतिबंदित करना एक बार सोचा जा सकता है किन्तु सोशल मीडिया पर  प्रतिबन्ध की बात करना अव्यवहारिक तो है ही साथ ही यह अधूरी समझ का नतीजा है।
हाल ही में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले जिसके मद्देनज़र फेसबुक, ट्विटर , यु-टूयूब आदि पर प्रतिबन्ध लगाने की बात कही गयी।यह अव्यावहारिक तो है ही साथ ही कई तकनीकी पेच की उलझाने भी इसमें है। तो ऐसे में अब सवाल यह उठता है की किस प्रकार से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हो रही हलचल की निगरानी की जा सके।
ऐसे में सरकार को चाहिए की वह एक ऐसा तंत्र बनाए जिसके द्वारा किसी भी ऐसी गतिविधि पर नज़र रखी जा सके जो देश की एकता व अखंडता पर प्रहार करती हो। ऐसे तंत्र को तैयार करने में पुलिस बलों को भी इसके अंतर्गत रखा जाना चाहिए। इस प्रकार की   अफवाहों को रोकने के लिए यह संभव है की आने वाले दिनों में पुलिस व अन्य सरकारी तंत्रों को फेसबुक, ट्विटर आदि का इस्तेमाल करना सिखाया जाए। इन सभी साइट्स का इस्तेमाल  करने वालो में सबसे अधिक युवा वर्ग है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की युवाओं में कोई भी अफवाह जंगल की आग की तरह  फैलती है। ऐसे में ऐसा तंत्र बनाना ही मात्र विकल्प के तौर पर नज़र आता है।

असम  में हो रही हिंसा या देश के अन्य  हिस्सों में उत्तरपूर्वी लोगो पर हो रहे हमले के लिए सोशल मीडिया को ज़िम्मेदार बताना स्थिति को नज़रंदाज़ करना है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए की सोशल मीडिया साधन मात्र है। वास्तव में दोषी वो लोग है जो इस प्रकार की अमानवीय नियत का प्रदर्शन कर रहे है।

Saturday, 28 July 2012

दादा बने नंबर वन ...!!!

यू.पी.ए  सरकार के संकट मोचक  प्रणब मुखर्जी अब देश के प्रथम नागरिक बन गए है।  प्रणब दा ने देश के 13वे  राष्ट्रपति के रूप में देश की कमान संभाल ली है। दादा  का   रायसीना हिल्स तक का यह सफ़र काफी रोचक रहा। वैसे  सम्वेह्धानिक तौर पर   हमारे देश के राष्ट्रपति चुनाव में आम जनता प्रत्यक्ष  तौर पर हिस्सा लेने की हक़दार नहीं है। मगर इस बार के राष्ट्रपति चुनाव लोक सभा चुनाव से  कम दिलचस्प नहीं रहे।
दोनों ही गठबन्धनो ने अपने उम्मेद्वारो को रायसीना हिल्स पहुचने की ठान ली थी। जहाँ एक तरफ  यू .पी .ए की तरफ से मैदान में प्रणब मुखर्जी को उतरने की बात कही जा रही थी। वही दूसरी तरफ  भाजपा ने  अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले थे। अभी   बड़े बड़े नेताओ के नाम पर चर्चा जारी ही थी की रांकपा के पी.ए.संगमा ने राष्ट्रपति  चुनाव लड़ने  की घोषणा कर दी थी। संगमा  ने खुद को रायसीना हिल्स तक ले जाने के लिए यह तर्क रखा था की वो देश में आदी वासी समुदाय का नेत्रत्व करते है और अभी तक देश में कोई भी आदिवासी राष्ट्रपति नहीं रहा। उनकी खुद की पार्टी ने इस दौड़ में उनसे दुरी बनाए रखी किन्तु नविन पटनायक और जय ललिता ने उनको अपना समर्थन दिया। यू.पी.ए  की तरफ से अब प्रणब  संगमा  के सामने थे। मगर दादा की इस दौड़ में दीदी अभी भी रूठी नज़र आ रही थी। केन्द्र सरकार  से बात बात पर नाराज़ रहने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री  ममता बनर्जी का रुख इस बार भी कुछ उकडी उकडी  सा  नज़र आया। हालाँकि एक बंगाली का राष्ट्रपति बनना पुरे पश्चिम बंगाल के लिए गर्व की बात मानी जा  रही थी मगर ऐसे में भी दीदी थी के मानने को तैयार नहीं। ममता बनर्जी ने हद तो उस वक्त कर दी जब उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम सुझा डाला। ममता बनर्जी की तरफ से दो अन्य नाम भी सुझाए गए मगर उन लोगो ने खुद ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया इसमें पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम का नाम भी शामिल था। ऐसे में एन.डी.ए से नाराज़ चल रहे बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने दादा को अपना समर्थन दे डाला। एन.डी.ए इस संकट से पार पा पाती की एन.डी.ए के एक और प्रमुख घटक दल  शिव सेना ने भी नितीश के नक़्शे कदम पर चलते हुए प्रणब दा  का समर्थन कर के अपने ही गठबंधन के लिए संकट बाधा दिया।
एन.डी.ए भी संगमा  का हाथ थाम अब चुनाव मैदान में थी।  संगमा भी अपने जीत के प्रति आश्वस्त थे। उन्होंने सभी दलों  से मिल कर वोट देने की अपील की और उन्हें पूरा यकीन था की 1967 के राष्ट्रपति चुनाव के तरह ही इस बार भी लोग अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनेगे। चुनाव की घडी नज़दीक आते आते यू.पी.ए  ने भी ममता को मानाने की पूरी कोशिश कर डाली। बसपा और सपा के सहयोग से मुखर्जी का पलड़ा भारी दिख रहा था तब भी दादा ममता के सहयोग के बिना यह चुनाव लड़ना नहीं कहते थे। देर सवेर दीदी भी मान गयी और दादा को समर्थन देने की बात कह डाली। अब यह सब आर्थिक सहयता से वंचित  ममता की नारजगी थी या कुछ और यह तो ममता ही जाने।
चुनाव नामांकन  नजदीक आते आते अपनी जीत से आश्वस्त संगमा  ने कई बातों पर  दादा प्रणब मुखर्जी के नाम पर कई सवाल उठाये चाहे वो भारतीय सांख्यकी समिति से इस्तीफा न देने की बात हो या उनके हस्ताक्षरों की प्रणब मुखर्जी ने सभी संकतो से पार पा लिया।
नामांकन के पश्चात पी.ए.संगमा और प्रणब मुखर्जी ही मैदान में बचे रहे बाकि सभी नामो को रद्द कर दिया गया।
नतीजो की घोषणा होने के बाद जहाँ एक तरफ प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन का रुख किया वही संगमा अब मुखर्जी की उम्मीदवारी  के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को तैयार दिखे मगर अब इस सफ़र में संगमा अकेले ही रह गए।

प्रणब दा  अब देश के 13वे  राष्ट्रपति  है। आज़ाद भारत का यह 14वा राष्ट्रपति  कार्यकाल है जिसकी ज़िम्मेदारी दादा के कंधो पर है। उम्मीद है यह कार्यकाल भी देश के पूर्व महान राष्ट्रपतियों के कार्यकाल जैसा रहते हुए देश तरक्की के मार्ग पर बढेगा। साथ ही प्रणब मुखर्जी का नाम इतिहास  के सुनहरे पन्नो पर स्वर्णीम  अक्षरों से लिखा जाएगा।